GPM DMF में ₹17.47 करोड़ का कथित घोटाला! 15% कमीशन का खेल, तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी पर गंभीर सवाल—क्या नेटवर्क की जड़ें राजधानी तक थीं?

रायपुर/GPM – खनन प्रभावित लोगों के विकास के लिए बना जिला खनिज न्यास (DMF) GPM में अफसरों की कमाई का जरिया बन गया था। जिले में DMF की राशि से जुड़े दस्तावेज स्वीकृति से लेकर भुगतान तक की प्रक्रिया में गंभीर गड़बड़झाले की तस्वीर सामने रखते हैं। न तो प्रबंधकारिणी समिति की बैठक आयोजित की गई और न ही शासी परिषद का अनुमोदन लिया गया, बावजूद इसके जिले में 160 कार्यों के लिए ₹17.47 करोड़ की प्रशासकीय स्वीकृति दे दी गई। इतना ही नहीं, तत्कालीन कलेक्टर लीना कमलेश मंडावी के तबादले के घटनाक्रम के बाद इन स्वीकृत कार्यों के लिए ₹8 करोड़ 32 लाख की पहली किस्त के चेक भी जारी कर दिए। अब वर्तमान कलेक्टर विजय दयाराम के. की कार्रवाई के बाद इस पूरे प्रकरण की कई परतें खुल रही हैं।
DMF में 15% कमीशन का पूरा गणित –

जिले में DMF का ऐसा खेल चला कि कमीशन के बंटवारे का पूरा गणित ही सामने आ गया। कलेक्टर से लेकर बाबू तक के हिस्से का 15% कमीशन पहले ही बंट जाता था। आखिर यह कमीशन व्यवस्था किसके इशारे पर चल रही थी और इसमें कौन-कौन शामिल था? इस पूरे कमीशन नेटवर्क की जांच हो जाए तो कई और गंभीर खुलासे हो सकते हैं। सवाल यह भी है कि कहीं पूरा प्रशासनिक तंत्र ही इस खेल का हिस्सा तो नहीं था? DMF का पैसा खनन प्रभावित आबादी के विकास के लिए है, किसी अधिकारी या कार्यालय के लिए अतिरिक्त कमाई का साधन बनने के लिए नहीं। यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि उन लोगों के हक पर चोट है, जिनके विकास के नाम पर यह राशि आवंटित की जाती है।
₹2 लाख का काम, ₹12 लाख का चेक!

कमीशन के बंटवारे के बाद इस पूरे खेल की तस्वीर और गंभीर हो जाती है। जहां काम की वास्तविक लागत करीब ₹2 लाख थी, वहां ₹12 लाख का चेक काट दिया गया। पर्यटन हो या राजमेरगढ़ में कंक्रीट का जंगल खड़ा करने का मामला, जिले में विकास के नाम पर भ्रष्टाचार की नींव खड़ी की गई। प्राकृतिक सुंदरता और खनिज संपदा से समृद्ध इस जिले में जिन पैसों से स्थानीय लोगों की जिंदगी बदलनी थी, उन्हीं पैसों के इस्तेमाल कमीशनखोरी और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया। मामला यहीं तक सीमित नहीं है। जहां जरूरत नहीं थी, वहां भी आंगनबाड़ी केंद्रों की मरम्मत और नए भवनों के निर्माण में DMF की राशि खर्च की गई। जबकि ये कार्य महिला एवं बाल विकास विभाग के दायरे में आते हैं। केंद्र सरकार जल जीवन मिशन के तहत हर घर तक नल से जल पहुंचाने की योजना चला रही है, लेकिन जिले में हैंडपंप खुदाई जैसे कार्यों पर भी DMF की राशि खर्च किए गए। शौचालय निर्माण, हाईमास्ट लाइट और जनपद पंचायत भवन के कामों में भी इस निधि का इस्तेमाल हुआ। इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री से शिलान्यास कराए गए एक निर्माण कार्य के स्थल के चिह्नांकन पर भी सवाल उठे हैं। यदि स्थल की पहचान और तकनीकी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी, तो परियोजना का प्रस्ताव किस आधार पर तैयार हुआ और शिलान्यास तक मामला कैसे पहुंच गया? अब जरूरत है कि प्रत्येक कार्य की स्वीकृति, वास्तविक लागत, भुगतान और मौके पर हुए निर्माण का मिलान किया जाए। क्योंकि DMF की राशि का उद्देश्य जिले में विकास की नई इबारत लिखना था, न कि सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर अनुत्तरित सवालों की लंबी फेहरिस्त खड़ी करना।
कहीं काम, कहीं जंगल के मोर नाचे!

जब खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए निर्धारित धन से ऐसे कार्य कराए जाएं जिनकी वास्तविक जरूरत, स्थान और विभागीय जिम्मेदारी स्पष्ट न हो, तो सवाल उठता है कि प्रस्ताव किसने बनाया और उसका औचित्य किसने जांचा। कहीं काम हुआ भी या केवल फाइलों में राशि स्वीकृत और भुगतान कर दिया गया इसका जवाब भौतिक सत्यापन से ही मिलेगा।
21 अक्टूबर 2026 के कलेक्टर के पत्र में 160 कार्यों को प्रबंधकारिणी समिति की बैठक और शासी परिषद के अनुमोदन के बिना प्रशासनिक स्वीकृति दिए जाने का उल्लेख है। पत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित क्षेत्रों के लिए निर्धारित 70:30 के अनुपात का पालन नहीं होने की बात भी दर्ज है। यह केवल तकनीकी चूक नहीं, बल्कि DMF के नियोजन और निगरानी की व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
सचिव पी. दयानंद की जवाबदेही कहां?
मामला जिले से निकलकर राजधानी तक पहुंच गया है। ऐसे में खनिज साधन विभाग के सचिव पी. दयानंद की भूमिका पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या विभाग को इन स्वीकृतियों और भुगतान की जानकारी समय पर मिली थी? यदि जानकारी थी, तो नियमों के पालन और सरकारी धन की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए गए? और यदि जानकारी नहीं थी, तो निगरानी की व्यवस्था इतनी बड़ी राशि के आवंटन और भुगतान पर नजर क्यों नहीं रख सकी? शासन को भेजी गई रिपोर्ट के बाद अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि विभाग ने मामले की जांच के लिए क्या कदम उठाए, किन अधिकारियों से जवाब मांगा और भुगतान तथा स्वीकृति की जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कहां तक पहुंची। सूचना उपलब्ध होने और कार्रवाई के बीच का अंतर भी जांच का विषय होना चाहिए।
GPM में DMF कमीशन का कथित खेल ऊपर तक? 10% तत्कालीन कलेक्टर, 3% डिप्टी कलेक्टर और 2% DMF बाबू के नाम पर कमीशन की चर्चा—क्या वर्षों की पदस्थापना के पीछे भी कोई राज?
क्या GPM में DMF के करोड़ों रुपये के कार्यों में कथित कमीशन का खेल केवल निचले स्तर तक सीमित था या इसके तार प्रशासन के ऊपरी स्तर तक जुड़े हुए थे? आरोपों में तत्कालीन कलेक्टर कमलेश/लीना मंडावी के नाम पर 10 प्रतिशत, डिप्टी कलेक्टर के नाम पर 3 प्रतिशत और DMF शाखा के बाबू दीक्सेना के नाम पर 2 प्रतिशत कमीशन की चर्चा सामने आने का दावा किया जा रहा है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो सवाल बेहद गंभीर है—क्या खनन प्रभावितों के विकास के लिए आवंटित करोड़ों रुपये की राशि में कथित कमीशन का कोई संगठित तंत्र सक्रिय था? क्या इस कथित नेटवर्क में अन्य प्रभावशाली लोगों की भी भूमिका थी? और तत्कालीन कलेक्टर की जिले में कई वर्षों तक पदस्थापना को लेकर उठ रहे सवालों का क्या कोई दस्तावेजी आधार है, या यह महज अटकल है? इन तमाम सवालों का जवाब केवल निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है। जरूरत है कि DMF के कार्यों की स्वीकृति, भुगतान, चेक जारी होने की प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की गहन जांच हो, ताकि स्पष्ट हो सके कि सरकारी खजाने से निकली रकम का वास्तविक लाभ किसे मिला और क्या किसी स्तर पर अनुचित कमीशन लिया गया। आखिर DMF का पैसा जनता के विकास पर खर्च हुआ या कथित कमीशन के खेल में कहीं और पहुंचा? अब जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि आरोपों की तह तक जाकर सच्चाई सामने लाएं और दोष साबित होने पर जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करें।
वर्तमान कलेक्टर की कार्रवाई से खुला मामला
वर्तमान कलेक्टर विजय दयाराम के. की ओर से शासन को जानकारी भेजे जाने के साथ ही कई चेक निरस्त किए गए। संबंधित अधिकारी-कर्मचारियों को हटाया भी गया।
और नए सिरे से प्रबंधकारिणी समिति की बैठक बुलाई गई। अब जरूरत है कि 160 कार्यों की सूची, स्वीकृति आदेश, चेक, बैंक भुगतान, माप पुस्तिकाएं, बिल और उपयोगिता प्रमाणपत्र का कार्यवार मिलान कराया जाए। जहां वास्तविक काम और भुगतान में अंतर मिले, वहां संबंधित अधिकारी, तकनीकी कर्मचारी और निर्माण एजेंसी की जवाबदेही तय हो।
DMF की राशि खनन प्रभावित जनता के विकास के लिए थी, अफसरों की तिजोरी भरने के लिए नहीं। अब सवाल सिर्फ 160 कार्यों और ₹17.47 करोड़ का नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की जवाबदेही का है, जिसकी निगरानी में यह सब हुआ। GPM से राजधानी तक अब हिसाब देना होगा किसने मंजूरी दी, किसने चेक काटे, किसने आंखें मूंदीं और आखिर इस पूरे खेल की कीमत जनता क्यों चुकाए ?









